ज़िंदगी केवल डेस्क और सोफे के बीच सीमित नहीं होनी चाहिए। शहरी दिनचर्या में छोटे-छोटे अवसर खोजकर शरीर को गतिशील रखना ही असल में सक्रिय रहना है।
लगातार 4-5 घंटे बिना उठे स्क्रीन के सामने काम करना—खासकर तब जब आप घर से काम कर रहे हों और डाइनिंग टेबल ही आपका ऑफिस बन गया हो—कंधों और पीठ को थका देता है। हर एक घंटे में उठकर खिड़की तक जाएं या एक गिलास पानी लेकर आएं।
मेट्रो स्टेशन की भीड़भाड़ में अगर एस्केलेटर या लिफ्ट के लिए लंबी लाइन है, और आपका शरीर सहज महसूस कर रहा है, तो सीढ़ियों का इस्तेमाल करें। यह छोटी सी आदत आपकी दिनभर की सक्रियता में बड़ा योगदान देती है।
रात के खाने के बाद तुरंत टीवी देखने या मोबाइल चलाने के बजाय, परिवार के सदस्यों के साथ कॉलोनी या सोसायटी के पार्क में 15 मिनट टहलें। इससे न सिर्फ भोजन आसानी से पचता है, बल्कि मानसिक तनाव भी कम होता है।
पुणे, मुंबई या दिल्ली जैसे शहरों में ट्रैफिक में ही घंटों बीत जाते हैं। ऐसे में भारी जिम रूटीन के बजाय, बस स्टैंड तक पैदल चलना, ऑटो स्टैंड तक की दूरी तय करना या आस-पास के बाज़ार तक पैदल जाना अधिक व्यावहारिक है। खुद को थकाएं नहीं, बस थोड़ा सक्रिय रखें।